Thursday, March 30, 2017

बुद्ध भगवान - आष्टांगिक मार्ग

चार आर्य सत्य 


१. दुःख:  इस दुनिया में सब कुछ दुःख है । जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है ।
२. दुःख प्रारंभ: तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है ।
३. दुःख निरोध: तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
४. दुःख निरोध का मार्ग: तृष्णा से मुक्ति आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है ।




आर्य-आष्टांगिक मार्ग



१. सम्यक दृष्टि: जो है, वही देखना। जैसा है, वैसा ही देखना। अन्यथा न करना। कोई धारणा बीच में न लाना। कामना, वासना, धारणा को बीच में न लाना। जो है, वैसा ही देखना।

२. सम्यक संकल्प: इसका अर्थ है कि जो करने योग्य है वह करना और उस पर पूरा जीवन लगा देना। करना किसी अहंकार के कारण न हो, वही सम्यक संकल्प। ऐसा संकल्प जो बोध से हो, जीवन की प्रौढ़ता से हो, क्षणिक उत्साह, लोग क्या कहेंगे इस भावना से न हों। जिसमें बाहरी उत्साह नहीं हो आतंरिक उत्साह हो।

३. 
सम्यक वाणीजो है, वही कहना। जैसा है, वैसा ही कहना। ऊपर कुछ, भीतर कुछ, ऐसा नहीं, क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले हो तो पहली शर्त तो पूरी करनी ही पड़ेगी कि तुम सच्चे हो जाओ। हानिकारक बातें और झूट न बोलना। व्यर्थ की बातें मत किए चले जाना। 


४. सम्यक कर्म :  वही करना, जो वस्तुत: तुम्हारा हृदय करने को कहता है। सम्यक कर्मात का अर्थ होता है, वही करना है, जो तुम्हें करने योग्य लगता है। ऐसे हर किसी की बात में मत पड़ जाना, नहीं तो तुम्हारी छीछालेदर हो जाएगी। सम्यक कर्मात का अर्थ है, एक दिशा पर नजर रखना। जो तुम्हें करना है, वही करना। हानिकारक कर्में न करना । 

५. सम्यक जीविका:  जीवन निर्वाह का मार्ग उचित होना चाहिये, बुद्ध कहते हैं, हर किसी चीज को आजीविका मत बना लेना। अब कोई आदमी कसाई बन कर अपनी रोटी कमा रहा है। यह भी कोई कमाना हुआ! रोटी ही कमानी थी, हजार ढंग से कमा सकते थे, कसाई होने की क्या जरूरत थी? रोटी तो कमानी ही है, यह बात सच है, लेकिन सम्यक खोजना। अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो तो ही तुम्हारे जीवन में शांति होगी। कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना  

६. सम्यक प्रयास : अति न करना, बुद्ध कहते हैं। कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं। आलसी उठता ही नहीं, तो पहुंचे कैसे! कर्मठ मंजिल के सामने से भी निकल जाता है दौडम्ता हुआ, रुके कैसे, वह रुक ही नहीं सकता। रुकने की उसे आदत नहीं है। जब तुम तीर को चलाओ, तब प्रत्यंचा सम्यक खिंचनी चाहिए। अगर थोड़ी कम खिंची तो पहले ही गिर जाएगा तीर। थोड़ी ज्यादा खिंच गयी तो आगे निकल जाएगा तीर। इसलिए बुद्ध का जोर अति वर्जित करने पर है।

७. सम्यक स्मृति:
 व्यर्थ को भूलना और सार्थक को सम्हालना। तुम अक्सर उल्टा करते हो। सार्थक तो भूल जाते हो, व्यर्थ को याद रखते हो। जीवन में जो भी बहुमूल्य है, उसको तो बिसार देते हो। सबसे ज्यादा बहुमूल्य तो तुम्हारी चेतना है, उसको तो तुम बिल्कुल बिसार कर बैठ गए हो और ठीकरे इकट्ठे कर रहे हो और उनका हिसाब लगा रहे हो। इसको बुद्ध ने कहा, सम्यक् स्मृति। बुद्ध के स्मृति शब्द से ही संतों का सुरति शब्द आया। सुरति स्मृति का ही अपभ्रंश है। जिसे कबीर सुरति कहते हैं, वह बुद्ध की स्मृति ही है। उसे थोड़ा मीठा कर लिया- सुरति, अपनी याद, अपनी पहचान। 

८. सम्यक समाधि: बुद्ध समाधि में भी कहते हैं सम्यक ख्याल रखना। क्यों? क्योंकि ऐसी भी समाधियां हैं, जो सम्यक नहीं हैं। जड़ समाधि। एक आदमी मूर्छित पड़ जाता है, इसको बुद्ध सम्यक समाधि नहीं कहते। ऐसा आदमी गहरी निद्रा में पड़ गया, बेहोशी। मन के तो पार चला गया है, लेकिन ऊपर नहीं गया, नीचे चला गया। मन तो बंद हो गया, क्योंकि गहरी मूच्र्छा में मन तो बंद हो जाएगा, लेकिन यह बंद होना कुछ काम का न हुआ। मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। मन तो चुप हो जाए, विचार तो बंद हो जाएं, लेकिन बोध न खो जाए। तीन स्थितियां हैं मन की। स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति। स्वप्न तो बंद होना चाहिए- चाहे सम्यक समाधि हो, चाहे असम्यक समाधि हो, स्वप्न तो दोनों में बंद हो जाएगा। विचार की तरंगें बंद हो जाएंगी। लेकिन जड़ समाधि में आदमी गहरी मूच्र्छा में पड़ गया, सुषुप्ति में डूब गया, उसे होश ही नहीं है। जब वापस लौटेगा तो निश्चित ही शांत लौटेगा, बड़ा प्रसन्न लौटेगा, क्योंकि इतना विश्राम मिल गया। लेकिन यह कोई बात न हुई! यह तो नींद का ही प्रयोग हुआ। यह तो योगतंद्रा हुई। असली बात तो तब घटेगी, जब तुम भीतर जाओ और होशपूर्वक जाओ। तब तुम प्रसन्न भी लौटोगे, आनंदित भी लौटोगे और प्रज्ञावान होकर भी लौटोगे। तुम बाहर आओगे, तुम्हारी ज्योति और होगी। तुम्हारी प्रभा और होगी। दो तरह की समाधियां हैं। जड़ समाधि, आदमी गांजा पीकर जड़ समाधि में चला जाता है, अफीम खाकर जड़ समाधि में चला जाता है। 





प्रज्ञा, शील,  समाधी

प्रज्ञा: (दिव्य दृष्टी ): सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प 

शील (
सदाचार)सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका

 समाधी (
एकाग्रता)सम्यक व्यायाम, सम्यक समाधि

सम्यक दृष्टी 
* उचित विचार करना 
* अंध विश्वास से दूर रहना
* सदा जागृत रहना
* जो है, वैसा ही देखना, 
धारणा को बीच में न लाना
* मिथ्या-दृष्टि का अंत करना

सम्यक संकल्प 
 * ध्येय, कर्म उचित और क्षेष्ट होनी चाहिये 

सम्यक वाणी 
* सत्य ही बोलना है
* व्यर्थ न बोलना 
* निंदा न करना 

सम्यक कर्म 
* उचित और सर्व लाभदायी कर्म करना 
* हानिकारक कर्में न करना 
* बुरे कर्मो का परित्याग करना 

सम्यक आजीविका 
* आजीविका क्षेष्ट होनी चाहिये 
* किसी को दुःख न देने वाली आजीविका होनी चाहिये 


सम्यक व्यायाम 
* आष्टांग मार्ग विरोधी चित्त प्रवृत्ती का विरोध और विनाश करना 
* सकारात्मक प्रवृत्ती का वृद्धी करना 

सम्यक स्मृति  
* निरंतर जागृता 
* कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि संसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है
* वासना पर निरंतर दृष्टि रखना
* व्यर्थ को भूल जाना 
*  सार्थ को  स्मरण में  रखना


सम्यक समाधि

* मन की एकाग्रता













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